Friday, January 16, 2015



बाल श्रम गंभीर चिंता का विषय....
आशीष शुक्ला
आजादी को 68 साल हो गये  परन्तु क्या आज व्यक्ति सच में आजाद है यह गंभीर चिंतन का विषय है। बाल मजदूरी,बधुंआ मजदूरी आज भी हमारे समाज में विद्यमान है जो अत्यधिक लज्जा का विषय है, सरकार इससे निपटने का पूरा प्रयास कर रही है, परन्तु लगातार नाकाम हो रही है। जिसका बहुत बड़ा कारण यह  है, कि बहुत से गरीब परिवार अपने बच्चों के मजदूरी के सहारे ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
दुनिया में लगभग २.५ करोड बच्चे, जिनकी आयु २-१७ साल के बीच है वे बाल-श्रम में लिप्त हैं, बाल श्रम कृषि निर्वाह और शहरों के अन-औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, भारत और बंग्लादेश सहित कई देशों में आज भी बाल श्रम व्यापक रूप से विद्यमान है। देश के कानून के अनुसार १४ वर्ष से कम आयु के बच्चे काम नही कर सकते, फिर भी मौजूदा कानून को नजरअंदाज किया जा रहा है। आज स्थिति तो यह है कि ११ साल जैसे छोटी उम्र के बच्चे २० घंटे तक एक दिन में काम कर रहे हैं। जो की भारत के भविष्य का खात्मा करने के लिए काफी है।  बाल मजदूरी औद्योगिक क्रांति के आरम्भ के साथ प्रारंभ हुई। देश के समक्ष बालश्रम की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कई गंभीर कदम उठाये हैं। समस्या के विस्तार और गंभीरता को देखते हुए इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानी जा सकती है। जो चेतना की कमी, गरीबी और निरक्षरता से जुड़ी हुई है। 1979 में भारत सरकार ने बाल-मज़दूरी की समस्या और उससे निज़ात दिलाने हेतु उपाय सुझाने के लिए 'गुरुपाद स्वामी समिति' का गठन किया था। समिति ने समस्या का विस्तार से अध्ययन किया और अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की। बच्चों का नियोजन इसलिए किया जाता है, क्योंकि उनका आसानी से शोषण किया जा सकता है। संविधान के मौलिक अधिकार में यह बताया गया है, कि 14 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा, परंतु आज जो लोग बाल मजदूरी करवाते हैं उनके लिए ना मौजूदा कानून मायने रखता और ना ही संविधान। दुनिया में जितने बाल श्रमिक हैं, उनमें सबसे ज्यादा बाल श्रमिक भारत में हैं। अनुमान है कि दुनिया के बाल श्रमिकों का एक तिहाई हिस्सा भारत में है। इस स्थिति का परिणाम बहुत व्यापक है। इसका मतलब यह है कि इस देश के करीब 50 प्रतिशत बच्चे बचपन के अधिकारों से वंचित हैं और वे अनपढ़ कामगार ही बने रहेंगे और उन्हें अपनी सच्ची क्षमताएँ हासिल करने का कोई मौका नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में कोई भी देश कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करने की उम्मीद कैसे कर सकता है।
देश में बाल श्रम की स्थिति की विडम्बना यह है कि यह मान ही लिया जाता है कि हर मजदूर इसलिये काम कर रहा है कि यह उसके परिवार के जिन्दा रहने का मामला है। लेकिन यह गरीबी की दलील का अत्यन्त कपटपूर्ण पहलू है। सच्चाई से इतना दूर और कुछ हो ही नहीं सकता। गरीबी की दलील’’ और शिक्षा की अप्रासंगिकता की अवधारणा ने बाल श्रम और शिक्षा से संबधित सरकारी कार्यक्रम बनने में मुख्य भूमिका अदा की है। बच्चे किसी देश या समाज की महत्वपूर्ण सम्पति होते हैं, जिनकी समुचित सुरक्षा, पालन-पोषण, शिक्षा एवं विकास का दायित्व भी राष्ट्र और समुदाय का होता हैं।  जहाँ एक ओर बाल कल्याण से संबन्धित अनेक विषयों पर विश्व जनमत गंभीरता से सोच रहा है, वहीं दूसरी ओर बाल श्रमिकों की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषकर विकासशील दिशों में यह समस्या अधिक विकराल रूप में दृष्टिगत हो रही है। आज विश्व में लगभग 25 करोड़ बाल श्रमिक हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाल मजदूरों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है। भारत में अनुमानत: बाल श्रमिकों की संख्या 440 लाख से 1000 लाख तक है, किन्तु अधिकृत रूप से इनकी संख्या 17.5 लाख बताई गई है। समस्त विश्व के 25 करोड़ बाल श्रमिकों में से मात्र भारत में ही इसके एक तिहाई बाल श्रमिक हैं। कुल बाल श्रमिकों का 30 प्रतिशत खेतिहर मजदूर तथा 30-35 प्रतिशत कल कारखानों में कार्यरत हैं। शेष भाग पत्थर खदानों, चाय की दूकानों, ढाबों तथा रेस्टोरेंट एवं घरेलू कार्यों में लगे हुए हैं, एवं गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं। बाल श्रमिकों के वर्त्तमान आंकड़े यह प्रदर्शित करते हैं कि कृषि क्षेत्र में 1 करोड़ 22 लाख, जम्मू कश्मीर के कालीन उद्योग में 1 लाख शिवकासी के आतिशबाजी और माचिस उद्योग में 1 लाख बच्चे, फिरोजाबाद के कांच उद्योग में 1 लाख बच्चे आगरा और कानपुर के चर्म उद्योग में 30 हजार बच्चे, लखनऊ में चिकन के काम में 50 हजार, बच्चे, भदोही के कालीन उद्योग में 1 लाख 25 हजार बच्चे, सहारनपुर के लकड़ी के उद्योग में 10 हजार बच्चे तथा मिर्जापुर में 8 हजार बच्चे एवं वाराणसी के रेशम उद्योग में 5 हजार बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं। हमारे समाज में चली आ रही शोषण परम्परा का बाल मजदूरी एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है, यह औद्योगिकरण की प्रक्रिया से उभरे मालिक मजदूर समीकरण का विस्तार है। वैसे तो दुनिया के अन्य देशों में भी यह एक विकट समस्या का रूप ले चुका है। लेकिन भारत में इसका रूप कुछ और ही भयावह है। बाल मजदूरी करवाने वालों के लिए कानून में निम्न प्रावधान हैं। काम करवाने वाले मालिक को तीन महीने से एक साल तक की कैद वह दस हजार से बीस हजार तक का जुर्माना देना पड़  सकता है। परन्तु जो व्यक्ति बाल मजदूरी करवाने का साहस कर सकता है उसके लिए इतनी सजा कफी है, यह विचार करनें लायक है। जब तक सरकार इस पर गहन विचार करके इसमें कोई बदलाव नहीं करती शायद तब तक बाल मजदूरी को नहीं रोका जा सकता। सरकार को मौजूदा सजा नीति को बदलना चाहिए। जब बाल मजदूरी करवाने वालों को किसी बड़ी सजा का भय नहीं होगा तब तक वह ऐसे ही बाल मजदूरी करवाते रहेगें। इस समस्या से समाधान पाने हेतु समाज के सभी वर्गों को सामूहिक प्रयास करना होगा तभी भारत को बाल श्रम मुक्त बनाया जा सकता है।

(यह लेखक के अपनें विचार हैं लेखक समाचार पत्र में सह-सम्पादक है)

Thursday, January 8, 2015

'प्रवासी सम्मेलन का बौद्धिक स्तर घट रहा है'

मोदी, डोनाल्ड रामअवतार
साल 2003 से साल 2015 के बीच प्रवासी भारतीय सम्मेलन में काफ़ी अंतर आया है, आजकल इस सम्मेलन का बौद्धिक स्तर कम हो रहा है.
पहले दो सालों में मैं गया था जब एलएम सिंघवी उसके चेयरमैन थे. उसके बाद जाना बंद हो गया. इधर पिछले दो-तीन सालों में फिर से जाने लगा.
पहले प्रवासी भारतीय सम्मेलन में हमारे विदेश में रहने वाले विद्वानों को बुलाया गया कि वे आकर बताएं कि भारत क्या है, कहां से आया, कहां जा रहा है. ऐसे लोग, देश के इतिहास, इसके तत्वचिंतन के बारे में कुछ कहें.
इन विद्वानों में वीएस नायपॉल और अमर्त्य सेन जैसे लोग आए थे. ये विद्वानों के भाषण हम सबके लिए प्रेरणास्पद होते थे. लेकिन आजकल सम्मेलन में बौद्धिक तत्व कुछ कम हो गया है.
भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बहुत अच्छा बोलते हैं, यह ठीक है लेकिन विद्वानों को बुलाया जाना कम हो गया है, इस बारे में सरकार को कुछ करना चाहिए.

स्वागतयोग्य क़दम

प्रवासी भारतीय दिवस
हालांकि पिछले कुछ सालों में एक स्वागतयोग्य बदलाव भी भी आया है.
पहले प्रवासी भारतीय और सरकार के बीच जो संवाद होता था उसमें सिर्फ़ सरकार बोलती रहती थी और प्रवासी भारतीयों को सुनना होता था, अब दो-तरफ़ा संवाद होता है.
प्रवासी भारतीय सम्मेलन का एक लक्ष्य यह है कि प्रवासी भारतीय भारत में आकर निवेश करें, और दूसरा यह कि प्रवासी भारतीय देश में दिलचस्पी रखें, इससे जुड़ाव महसूस करें.
लेकिन मेरे ख़्याल से दो लक्ष्य और होने चाहिए. पहला तो यह कि भारत में जो हो रहा है उसे प्रवासी भारतीयों को समझाने की ज़रूरत है.
दूसरी बात यह कि सभी प्रवासी भारतीय पैसे वाले नहीं हैं. प्रमुख तौर पर क़रीब 44 देशों में भारतीय रहते हैं, जिनमें से सिर्फ़ दो या तीन देशों में ही पैसे वाले भारतीय प्रवासी हैं.
इसलिए सरकार चाहिए कि वो उन प्रवासियों का भी योगदान ले जो पैसे वाले नहीं हैं, जो अध्यापक हैं, वैज्ञानिक हैं.

वैज्ञानिकों ने किया है नाम

गुयाना के राष्ट्रपति डोनाल्ड रामअवतार
गुयाना के राष्ट्रपति डोनाल्ड रामअवतार प्रवासी भारतीय दिवस को संबोधित करते हुए
दुनिया में भारत का जितना नाम पैसे वालों ने किया है उससे ज़्यादा भारतीय वैज्ञानिकों और विद्वानों ने किया है. लेकिन सम्मलेन में अब इन लोगों के लिए उतनी जगह नहीं है.
भारत सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों भारत में आकर विभिन्न प्रयोगशालाओं से अनुबंध करें और विज़िटिंग प्रोफ़ेसर की हैसियत से साल में दो महीने यहां रहें.
सरकार को चाहिए कि वो प्रवासी भारतीय विद्वानों से कहे कि वो भारतीय विश्वविद्यालयों में आकर पढ़ाएं. यहां के विद्यार्थियों को अपने विश्वविद्यालयों में ले जाएं. भारत के लिए इस तरह का बौद्धिक योगदान बहुत ज़रूरी है.BBC HINDI SE

Wednesday, January 7, 2015

क्या पहलवान दो दिन में बांधते हैं लंगोट?

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बीबीसी हिन्दी ने एक विशेष सीरीज़ के तहत कुश्ती और उससे जुड़े अनेक पहलूओं को आपके सामने प्रस्तुत कर रही है. सिरीज़ की इस कड़ी में कुश्ती और पहलवानों से जुड़े कुछ मिथकों को जांचने की कोशिश की गई.
इसमें हमारी मदद की वर्तमान में भारत के लिए कुश्ती में दो ओलिंपिक पदक जीतने वाले पहलवान सुशील कुमार ने.
क्या पहलवानों के लिए ब्रहमचर्य का पालन करना बेहद ज़रूरी होता है या यह केवल एक मिथक है?
ये बात सही है कि ब्रह्मचर्य के पालन से एक पहलवान में निष्ठा आती है वो डिसिप्लिन में आता है लेकिन सिर्फ़ ब्रह्मचर्य से काम नहीं चलता और न ही ये कोई अनिवार्यता है. ब्रहमचर्य के साथ साथ अच्छी डाईट और प्रॉपर ट्रेनिंग भी बहुत ज़रूरी है.
बीते वक़्त में ऐसे लंगोट भी होते थे जिन्हें बांधने में दो दिन लग जाते थे क्या ये सही है?
नहीं ये एक कहावत है जो कि नए बच्चों को खींचने के लिए बोली जाती है. दरअसल लंगोट बांधने का एक विशेष तरीका होता है वर्ऩा ये कुश्ती के दौरान खुल जाता है. जिन पहलवानों को इसे बांधना नहीं आता वो इसमें काफ़ी देर उलझे रहते थे. तब कहा जाता है कि ये दो दिन में लंगोट पहनता है, कुश्ती न जाने कब लड़ेगा.
क्या पहलवानों के कान तोड़े जाते हैं?
नहीं कान तोड़े नहीं जाते टूट जाते हैं. ये एक प्रक्रिया है, दरअसल अत्यधिक परिश्रम करते समय शरीर का तापमान एक विशेष स्तर पर पहुंचने पर आपके कान पर लगा हल्का सा हाथ भी आपकी रक्त कोशिकाओं को फाड़ सकता है या आपकी कान की हड्डी को तोड़ सकता है.
कान में ख़ून भर जाने से कान की बनावट में बदलाव आ जाता है लेकिन पहलवा इसका इलाज नहीं करवाते क्योंकि इलाज के बाद ये फिर टूट सकते हैं लेकिन टूटे रहने पर इनमें कोई समस्या नहीं होती. अंग्रेज़ी में इसे कॉलीफ़्लावर ईयर भी कहते हैं यानि गोभी के फूल जैसे कान.
कुछ पहलवान टूटी हड्डियों को जोड़ने कि दुकान खोल लेते हैं और फिर पट्टियां करके चोट ठीक करने का दावा करते हैं क्या ये सही है?
देखिए कुछ चोटें वो ठीक कर सकते हैं क्योंकि पहलवानी में चोट लगना और फिर आर्युवेदिक तरीके से उसका उपचार करना सामान्य बात है. कई बार कुश्ती करते समय मोच आ जाती है या कंधा उतर जाता है. एक पहलवान को शारिरिक संरचना का इतना ज्ञान होता है कि वो खुद ही इसे ठीक कर लेते हैं तो हां कुछ पहलवान ऐसा कर सकते हैं.
क्या ये बात सही है कि पहलवान बहुत ज्यादा खाते हैं?
सरासर ग़लत है. पहलवानों को अपने वज़न को लेकर बेहद सतर्क रहना होता है. आपके वज़न में 100 ग्राम की तब्दीली भी आपको गलत भार वर्ग में ला सकती है, जिससे उसे मुश्किल हो सकती है.
एक पहलवान ज़्यादा खा ज़रूर सकता है लेकिन अच्छा पहलवान ऐसा कभी नहीं करेगा.
क्या अखाड़े की मिट्टी में औषधीय गुण होते हैं या ये सिर्फ़ एक किंवदंती?
ये कहना ग़लत होगा कि ऐसा नहीं है. लेकिन हर अखाड़े कि मिट्टी में ऐसा हो ये बात भी नहीं है. दरअसल किसी भी अखाड़े में मिट्टी डालते समय उसमें हल्दी, तेल, मेंहदी को भर भर कर मिलाया जाता है ताकि वो नरम रहे और शरीर की चोट को ठीक करे.
पहले के जमाने में अखाड़े कि मिट्टी में दूध या मठ्ठा भी मिलाया जाता था और कई बार चोट लगने पर अखाड़े की मिट्टी के लेप से चोट ठीक हो जाती थीं लेकिन ये सही है कि आजकल ऐसा नहीं है क्योंकि अखाड़े में अब सामान्य मिट्टी मिलाई जाती है जिसमें सिर्फ़ पानी होता है
क्या डब्लयूडब्लयूई की कुश्तियां भी असली होती है?
अगर आप पूछेंगे कि क्या वो सच में लड़ते हैं तो जवाब है, हां वो लड़ते हैं लेकिन दिखावे के लिए. वो सिर्फ़ प्रदर्शन है और विजेता कौन होगा ये पहले से तय होता है वर्ना जो दांव को वो लगाते हैं उन दांव से भारी से भारी पहलवान भी ज्यादा देर नहीं चल सकता.
मेरे गुरु और ससुर महाबली सतपाल को भी ऐसी कुश्ती का अनुभव है लेकिन वो भी इसे छोड़ आए थे क्योंकि वहां नतीजे पहले से तय होते थे. लेकिन हां वो लड़ते हैं और उन्हें चोट भी सच में लगती है.BBC HINDI

श्रीलंका: राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव शुरूझा कीजिए

लाखों श्रीलंकाई अपने नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए मतदान कर रहे हैं.
साल 2005 से सत्ता पर क़ाबिज़ राजपक्षे ने आसान जीत की उम्मीद में दो साल पहले ही चुनाव करवा दिए हैं लेकिन उन्हें पूर्व मंत्रिमंडलीय सहयोगी मैथ्रिपाला सिरिसेना से कड़ी चुनौती मिल रही है.
श्रीलंका में 2009 में गृहयुद्ध ख़त्म होने के बाद राजपक्षे लोकप्रियता की लहर पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचे थे लेकिन अब उन पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं.
उनके परिजन देश के कई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पदों पर विराजमान हैं और आलोचकों का कहना है कि वह देश को एक पारिवारिक कारोबार की तरह चला रहे हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि सिरिसेना इस विचार का फ़ायदा उठा रहे हैं और सिंहलियों में लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं जो सामान्यत: राजपक्षे को वोट देते थे.
सिरिसेना को नस्लीय अल्पसंख्यकों के मत भी मिलने की उम्मीद है जो श्रीलंका की जनसंख्या में 30 फ़ीसदी हैं.
राजपक्षे अब भी सिंहली-बहुल जनसंख्य में बेहद लोकप्रिय हैं.
वह गृहयुद्ध को ख़त्म करने वाले नेता से लेकर उल्लेखनीय आर्थिक विकास के समय तक सत्ता में रहे हैं.
अब तक चुनाव प्रचार हिंसा और धमकियों के आरोपों से भरा रहा है.
बुधवार को ही एक विपक्षी कार्यकर्ता की मौत एक दिन पहले रैली में गोली मारे जाने से हो गई.
एक चुनाव अधिकारी ने कहा कि वह उन दावों की जांच कर रहे हैं कि तमिल क्षेत्रों में सेना तैनात कर दी गई है ताकि कथित रूप से तमिलों को मतदान से रोका जा सके. BBC HINDI SE

Tuesday, January 6, 2015

मोदीराज में 2015: देश में सब कुछ ठीक है?

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नरेंद्र मोदी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ.
पिछली मई में नरेंद्र मोदी को मिली चुनावी कामयाबी में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अलावा आम लोगों की उम्मीदें भी बड़ा कारण बनीं थीं. लोगों को ये लग रहा था कि मोदी 'गुजरात मॉडल' के तर्ज़ पर आर्थिक विकास लाएंगे.
यही वजह थी कि सीएसडीएस-लोकनीति की ओर से कराए गए एक सर्वे में जब लोगों से ये पूछा गया कि वे भारत के किस राज्य को सबसे अधिक विकसित मानते हैं तो 64 फ़ीसदी लोगों का जवाब गुजरात था.
इस सर्वे में 22 हज़ार लोगों ने भाग लिया था जिनमें जबकि महज़ चार फ़ीसदी ही लोगों ने कहा, 'महाराष्ट्र.'

पढ़ें पूरा विश्लेषण

प्लानिंग कमीशन, योजना आयोग

जबकि हक़ीक़त ये है कि सामाजिक विकास के मापदंडों पर गुजरात महाराष्ट्र से पिछड़ा हुआ है और कई ऐसे राज्य भी हैं जिनके सकल घरेलू उत्पाद में इज़ाफ़ा गुजरात से बेहतर हुआ है. लेकिन लोगों की मान्यताओं और उम्मीदों से फ़र्क़ पड़ता है.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने हुए सात महीने हो गए हैं और लोगों की उम्मीदें विकास के मुद्दे पर, सामाज के बुनियादी ढांचें, सरकार के कामकाज, राजनीतिक स्थिरता और विदेश नीति के सवाल पर मोदी का इम्तिहान ले रही हैं. और ये साफ नहीं है कि वे इसे पूरा कर पाएंगे या नहीं.
अभी तक हमने कई जुमले सुने हैं जैसे कि 'मेक इन इंडिया' और इस कड़ी में सबसे ताज़ा उदाहरण 'एनआईटीआई' या 'नीति आयोग' है.

खुले बाज़ार की नीति

शॉपिंग मॉल, मार्केट, बाज़ार

निवेश दर को बढ़ाने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया है जो जीडीपी को 4.7 फ़ीसदी की निराशाजनक स्थिति से ऊपर उठाने के लिए ज़रूरी था और न ही लोगों की भलाई के लिए ऐसा कुछ किया गया है.

सरकार अभी भी खुले बाज़ार पर सब कुछ छोड़कर चल रही है.
उसने विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु की उस चेतावनी को भी नज़रअंदाज़ कर दिया कि 'मुक्त बाज़ार का मॉडल' हर जगह नाकाम हो गया है.
भारत में सरकारी निवेश की रफ़्तार भी सुस्त बनी हुई है और क़र्ज़ के बोझ से जूझ रहा निजी क्षेत्र भी निवेश करने से घबरा रहा है, ख़ासकर उत्पादन क्षेत्र में.

निजी क्षेत्र के साथ सरकारी साझेदारी में बनने वाली परियोजनाओं की लागत बहुत ज़्यादा पड़ रही है और उनसे वक़्त पर नतीजे भी नहीं मिल पा रहे हैं.

बाज़ार में उछाल!

शेयर बाज़ार
मोदी को बस 'क्रॉनी कैपिटलिज़्म' का मॉडल या पूंजीवाद का वो चेहरा, जिसमें कारोबार की ताक़त सत्ता तक पहुंच रखने वाले लोगों तक सिमट जाती है, समझ में आता है.
लेकिन इससे कोई गुणवत्ता वाला विकास नहीं होने वाला.
ये एक ऐसा रास्ता है जो ग़ैरबराबरी की तरफ़ जाता है. यहां तक कि इससे नौकरियों के मौक़े भी ज़्यादा नहीं पैदा होंगे.

भारत में बढ़ रहे कामगारों को काम देने के लिए देश में हर महीने कम से कम दस लाख नई नौकरियों की ज़रूरत है.

इसलिए बनावटी तरीक़ों की बदौलत शेयर बाज़ार में भले ही उछाल आ सकता है लेकिन अर्थव्यवस्था हक़ीक़त में वैसी ही रहेगी.
ख़ासकर भारत के बीमारू कहे जाने वाले राज्यों को इसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ सकता है क्योंकि पैसे के आवंटन और उनकी वास्तविक ज़रूरतों के मूल्यांकन के लिहाज़ से नीति आयोग, योजना आयोग का किसी भी तरह से विकल्प नहीं है.

मनरेगा में कटौती?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी स्कीम
मोदी सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) समेत सामाजिक भलाई की तमाम योजनाओं में कटौती कर रही है.
कल्याणकारी योजनाओं को लेकर उसकी इच्छा है कि सीधे नक़द मदद दे दी जाए लेकिन इसे लागू करने के ज़रूरी बुनियादा ढांचा बहुत ही कमज़ोर है. और पैसे से उन ज़रूरतों को बिल्कुल ही नहीं पूरा किया जा सकता है जो स्थानीय तौर पर उपलब्ध ही नहीं रहतीं.
सबसे ज़्यादा ख़राब बात तो ये हुई है कि सरकार ने भूमि अधिग्रहण क़ानून में अध्यादेश के ज़रिए संशोधन का क़दम उठाया है.
इसके ज़रिए उन परियोजनाओं को इससे प्रभावित होने वाले 70 से 80 फ़ीसदी लोगों की सहमति लेने की शर्त में छूट दी गई है और इतना नहीं बल्कि वन अधिकार क़ानून के असर को भी कम करने की कोशिश की गई है.

संसद की गरिमा

भारत की संसद
यह लोगों की आजीविका पर एक गंभीर हमला कहा जा सकता है.
प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और परिवहन व्यवस्था को तरजीह, जंगलों में लूट खसोट वाली परियोजनाओं को मंज़ूरी और अनिवार्य क़ानूनों को कमज़ोर करने जैसे क़दमों के ज़रिए मालूम पड़ता है कि सरकार ने पर्यावरण पर चुपके से हमला बोल दिया है.
पर्यावरण को होने वाला नुक़सान भारत की जीडीपी को 5.7 फ़ीसदी के बराबर नुक़सान पहुंचाता है. ये आंकड़ें उसकी विकास दर से कहीं ज़्यादा हैं. यह क़ीमत और बढ़ने वाली है.
मोदी अध्यादेश के ज़रिए शासन करना चाह रहे हैं और इससे संसद की गरिमा को नुक़सान पहुंच रहा है.
परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वे अमरीकी रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं को ख़ुश करने के लिए न्यूक्लियर लायबिलिटी क़ानून को फिर से लिखने की कोशिश कर रहे हैं.

भारत रत्न सम्मान

अटल बिहारी वाजपेयी
तमाम अच्छी सलाहों के बावजूद जजों की नियुक्ति के मसले पर सरकार को बेइंतहा अधिकार देकर वे न्यायपालिका को भी कमज़ोर कर रहे हैं. इसके ख़राब नतीजे हो सकते हैं.
इस बीच ख़ुद को हिंदुत्व का झंडाबरदार कहने वाले गुट 'रामज़ादा-हरामज़ादा' के स्तर की बयानबाज़ी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ घर वापसी अभियान के ज़रिए उत्पात पर उतर आए.
ये हिंदुत्ववादी गुट शिक्षा और संस्कृति के मोर्चे पर भगवा एजेंडे को आगे बढ़ा रही सरकार से उत्साहित लगते हैं.
अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को क्रिसमस के दिन भारत रत्न सम्मान देकर उन्होंने इस दिन के महत्व को कमतर करने की कोशिश की है.
घृणा फैलाने वाली बयानों पर प्रधानमंत्री मोदी ने कामचलाउ एतराज़ ही जताया लेकिन हक़ीक़त में उन्होंने संसद में बयान देने से इनकार करके उलटे संकेत दिए.

हिंदुत्व का एजेंडा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
यहां तक कि सुषमा स्वराज ने भी गीता को 'राष्ट्रीय ग्रंथ' घोषित करने की मांग कर डाली जबकि संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता है.
कारोबार जगत में मौजूद मोदी के समर्थक और दुविधा में पड़े हुए उदारवादी 'विकास' के एजेंडे से इस 'भटकाव' को लेकर निराश हैं.
लेकिन मोदी का निर्वाचन किसी 'विकास' के मुद्दे पर नहीं हुआ है.
यह हिंदुत्व के एजेंडे को चाशनी में लपेटकर पेश करने जैसा था जिससे उनकी अपील का विस्तार किया जा सके.
यहां तक कि भाजपा ने पहले के विपरीत ऐसा कोई दावा भी नहीं किया कि वे हिंदुत्व से फ़ासला बनाए रखेंगे.
मोदी के लिए अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाज से ज़्यादा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के असर को बढ़ाना है.

पड़ोसियों से रिश्ते

शी जिनपिंग, नरेंद्र मोदी
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
अगर संघ के एजेंडे और विकास में किसी तरह का कोई टकराव हुआ तो संघ को ही तरजीह मिलनी है.
घरेलू मोर्चे पर नाराज़गी के साथ साथ भारत के पड़ोस में अस्थिरता और असुरक्षा का माहौल बढ़ सकता है.
चीन से निपटने के लिए मोदी अमरीका, जापान और अन्य एशियाई देशों के साथ नज़दीकी संबंध बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं और इसराइल को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.
लेकिन वे चीन के साथ जुड़ने में नाकाम रहे हैं, पाकिस्तान से तनाव और बांग्लादेश से मतभेद की स्थिति है. 2015 में ये सब बातें भारत को मुश्किल में डालेंगी.
भारत की सुरक्षा पड़ोसियों के साथ दोस्ताना संबंध रखने में है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
बीबीसी हिन्दी से

गुरमीत राम रहीम की 'रहस्यमयी दुनिया'साझा कीजिए

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डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख 47 वर्षीय गुरमीत राम रहीम इन दिनों अपनी फ़िल्म एमएसजी(मैंसेंजर ऑफ गॉड) और अपने आश्रम की निजी सेना को प्रशिक्षण देने के मुद्दे को लेकर चर्चा में हैं.
राम रहीम इससे पहले भी विभिन्न विवादों के कारण चर्चा में रहे हैं.
गुरमीत राम रहीम पर सीबीआई ने दो हत्याओं में आरोप पत्र दाखिल किया है. वहीं पंचकुला की सीबीआई अदालत में उनपर दो साध्वी के साथ बलात्कार का मामला चल रहा है. इन मामलों में अभी सुनवाई चल रही है.
राम रहीम के व्यक्तित्व और धर्मगुरु के तौर पर कारोबारी साम्राज्य की पड़ताल.

पढ़ें रिपोर्ट विस्तार से

गुरमीत राम रहीम पर अदालत में हत्या, बलात्कार और जबरन नसबंदी कराने का मामला चल रहा है.
नसबंदी के मामले में प्रशासन ने अदालत के आदेश के बाद सात लोगों की चिकित्सीय जांच कराकर पाया कि उनकी नसबंदी हुई थी.
जनहित याचिका दाखिल करने वाले हंसराज चौहान के मुताबिक गुरमीत राम रहीम के निर्देश पर चार सौ लोगों की जबरन नसबंदी हुई. सीबीआई इस मामले की भी जांच कर रही है.
इन गंभीर आरोपों के अलावा हाई कोर्ट ने सिरसा ज़िला प्रशासन को गुरमीत राम रहीम के आश्रम में हथियार होने की जांच करने को कहा था. पिछले सप्ताह ही पुलिस अधिकारियों ने डेरा सच्चा सौदा की तलाशी ली, लेकिन तलाशी में क्या मिला इसपर पुलिस ने कुछ भी नहीं कहा है.
गुरमीत राम रहीम उनपर लगे आरोपों को अपने ख़िलाफ़ षडयंत्र बताते हैं. उनके मुताबिक उनके अभियानों के चलते ड्रग्स, मांस और वेश्यावृति का कारोबार करने वाले लोगों को नुकसान पहुंचता रहा है और वे लोग गुरमीत राम रहीम के ख़िलाफ़ षड्यंत्र कर रहे हैं.

बाबा का चमत्कार

डेरा सच्चा सौदा के दावे के मुताबिक उनके किडनी दान, रक्त दान और नेत्र दान जैसे कई कार्यक्रमों ने बीते एक दशक में गिनीज और लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में जगह बनाई है.
गुरमीत राम रहीम और उनके समर्थक फिल्म एमएसजी के बारे में संवाददाताओं को ज्यादा सवाल भी नहीं पूछने देते. ये फिल्म गुरमीत राम रहीम को सुपर बाबा के तौर पर दर्शाती है जो अकेले दम पर ड्रग्स और वेश्वावृति का कारोबार करने वाले गुंडों का सफाया कर देता है.
गुरमीत राम रहीम के मुताबिक ये फिल्म ड्रग्स और वेश्यावृति के ख़िलाफ़ है. बाबा अपनी फ़िल्म के हीरो, निर्माता-निर्देशक, गीतकार, गायक, संगीतकार हैं. फ़िल्म 16 जनवरी को रिलीज़ हो रही है.
इस फिल्म का सीक्वल भी जल्द लाने की तैयारी है. एमएसजी पार्ट-2 आदिवासियों के उत्थान पर होगा. बाबा के मुताबिक इस फिल्म की 85 फ़ीसदी शूटिंग पूरी हो चुकी है.

षड्यंत्र रचे जाने का आरोप

गुरमीत राम रहीम दावा करते हैं कि वे कई विधाओं में सिद्धहस्त हैं. उनका दावा है कि वो हीप हॉप, फ्यूज़न, फोक, जैज, रैप, 107 कंसर्ट में म्यूज़िकल प्रस्तुति दे चुके हैं और अपनी युवावस्था में 32 खेलों में हिस्सा ले चुके हैं.
लेकिन उनको लेकर इतना विवाद क्यों है पूछे जाने पर कहते हैं, "ये 1992 से शुरू हुआ. हमारे पास एक लेटर आया जिसमें ब्योरा था, इतनी शराबबंदी आपने कराई, इतनी अफ़ीम बंद करा दी, इतनी हेरोइन, इतना घाटा हमें आपकी वजह से हुआ उत्तर भारत में. आपको छोड़ेंगे नहीं..हमें लग रहा है ये ऐसी ही ताक़तें है जो ये सब कर रही हैं."
दूसरे लोगों ने भी ड्रग्स का कारोबार करने वालों के ख़िलाफ़ संघर्ष किया है, लेकिन उन पर किसी तरह के आरोप नहीं लगे. इसके जवाब में गुरमीत राम रहीम कहते हैं, "उनके साथ क्यों नहीं हुआ ये हमें नहीं पता. हमने 5 करोड़ लोगों का नशा छुड़वा दिया है. उन्होंने कितना छुड़ाया ये भगवान जाने. उन्होंने बातें ही की हैं या घरों में जाकर काम किया?"

अदालत में पेशी

सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने छापी थी बाबा के ख़िलाफ़ रिपोर्ट.
स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की अक्टूबर, 2002 में हत्या करने वाले कथित शूटर निर्मल सिंह और कुलदीप सिंह के पास से डेरा सच्चा सौदा के मैनेजर किशन लाल की लाइसेंसी बंदूक़ मिली थी और इन दोनों के पास डेरा के नाम पर पंजीकृत वाकी-टाकी भी पाया गया था.
ये सवाल पूछने पर राम रहीम का जवाब था, "हमने किसी को नहीं बोला कि आप किसी का बुरा करें. पांच करोड़ लोग हैं, उनमें कौन कहां कैसा है, ये राम जाने."
राम रहीम आरोपों से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहते हैं, "हम कैसे मानें कि हमारी जिम्मेवारी है, अगर ऐसा कुछ होता तो क्या दूसरे यहां पर ठहरते. क्या पढ़े लिखे लोगों की सैकड़ों बेटियां यहां पर रुकतीं. अगर जबरदस्ती या बुरा कर्म करते तो क्या हमारी संख्या चार गुना बढ़ती."
अदालत में सुनवाई के दौरान अनुपस्थित रहने के बारे में पूछे जाने पर, गुरमीत राम रहीम ने कहा, "एक दो बार छोड़कर कभी ऐसा हुआ ही नहीं कि हम नहीं गए. एक बार ऐसा भी हुआ कि सुनवाई रोज़ होती थी, फिर भी हम गए...हमेशा जाते हैं."

कारोबारी साम्राज्य

गुरमीत राम रहीम के भारत के कई राज्यों में आश्रम हैं, जिनमें हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र शामिल हैं.
सिरसा में सैकड़ों एकड़ में बने दो आश्रम हैं. डेरा सच्चा सौदा ट्रस्ट का एक मार्केट कॉप्लैक्स भी है, जिसमें प्रत्येक दुकान का नाम 'सच' से शुरू होता है, मसलन सच हार्डवेयर, सर्च मेडिकल स्टोर एवं सच पेट्रोल पंप. यहाँ स्कूल, रेस्तरां, अनाथ लड़कियों के लिए शेल्टर, तीन अस्पताल और होटल भी हैं.
बाबा खुद को अध्यात्मिक गुरु कहते हैं लेकिन अत्याधुनिक सुख सुविधाओं वाला जीवन जीते हैं. महंगे वस्त्रों के अलावा, पंखों की पगड़ी और चमकदार जूतियां पहनते हैं और सुपर लग्जरी कारों के काफिले में चलते हैं.
डेरा का दावा है कि वो एक सामाजिक अध्यात्मिक संस्था है. इसकी सात विभिन्न इकाइयों हैं जो प्रसाशनिक, चिकित्सीय, शैक्षणिक, आईटी और सामाजिक कल्याण की गतिविधियों से जुड़ी हैं.
एक राजनीतिक इकाई भी है जो चुनाव के दौरान किसी भी राजनीतिक पार्टी को समर्थन देने का फ़ैसला लेती है. पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान डेरा सच्चा सौदा ने भारतीय जनता पार्टी का समर्थन किया था. भारतीय जनता पार्टी के कई उम्मीदवारों ने बाबा राम रहीम के सामने सिर झुकाया था.
इस फ़ैसले के बारे में पूछे जाने पर गुरमीत राम रहीम ने कहा, "हमारा राजनीति से कोई लेना देना नहीं है. हम सिर्फ़ यही कहते हैं जो अच्छे कर्म करें उनका साथ दें. संगठन ने बोला जो कन्या भ्रूण हत्या, वेश्यावृति, ड्रग्स के कारोबार और सफ़ाई को लेकर जो सबसे ज़्यादा हलफ़नामा भरे उसका साथ दें."

निजी सेना रखने का आरोप

डेरा सच्चा सौदा में राम रहीम की निजी सेना चप्पे-चप्पे पर नजर आती है.
2007 में गुरमीत राम रहीम पर ये भी आरोप लगा था कि वे ठीक उसी तरह की पोशाक पहने हुए थे, जिस तरह की 10वें सिख गुरु गोविंद सिंह पहना करते थे. इस पर गुरमीत राम रहीम कहते हैं, "हम 1991 से ऐसी वेशभूषा पहन रहे हैं. वो वेशभूषा चुड़ीदार पायजामा और कलियों का कुर्ता, जो मुगल बादशाह पहना करते थे, गुरु गोविंद सिंह नहीं."
बाबा राम रहीम ये भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले से स्वच्छता और कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा उठाते रहे हैं.
बहरहाल, अपनी फ़िल्म लेकर आ रहे बाबा राम रहीम को धर्मगुरुओं पर तंज कसने वाली आमिर ख़ान की फिल्म 'पीके' नहीं पसंद आई है।
बीबीसी हिन्दी से