इंसान की मासिकता
इंसान के कार्य उसकी मासिकता पर निर्भर हैं चाहे वह छोटे कार्य
हो यह बड़े कहते हैं इंसान जैसा सुनता हैं वैसा बोलता हैं और जैसा देखता हैं वैसे करता
हैं यह उसकी पुरानी प्रवृति है। आशाएं होना मनुष्य के कार्य करने की उतसुकता को
दर्शाती हैं आशाएं काम करने की छमता को बढ़ाती हैं पर यह हमारी मासिकता पर निर्भर
करती हैं, कि हमारी आशाएं क्या हैं। हम अपनें दैनिक
जीवन में तरह-तरह के व्यक्तियों से मिलते हैं और एक दूसरे के
व्यक्तव्य को सुनते समझते हैं और उनके व्यक्तिव को समझने की कोशिस करते हैं। पर हम
भली भातिं किसी की मासिकता को नही पढ़ सकते कोई हमारे प्रति कैसी सोच रखता हैं यह
परख पाना हमारे लिए मुशकिल है। प्रतेक व्यक्त की अपनी विचार धाराएं और अपनी सोच
होती है कहते हैं वक्त के के साथ-साथ इंसान इंसान को भूल
जाता यह कितने हदतक सही है इसपर कहना खासा मुशकिल हैं। हम किसी दूसरे के प्रति
अच्छी गलत कैंसी भावनाये रखते हैं यह हमसे बेहतर खोई नही जान सकता प्रायः हमरे अंदर
यह इच्छा जागृत होती रहती है की दूसरा कोई हमारे बारे में क्या सोचता है यह जानने
की हम भरपूर कोशिस करते हैं। पर आसफल रहते हैं क्योकि दूसरे की मासिकता को नही
समझा जा सकता है। सामने होता कुछ और है और सच्चाई कुछ और होती है। अगर कहा जाए की
जो होता है वह दिखता नही और जो दिखता है वो होता नही तो शायद यह निर्विवाद होगा।
हम चाहकर भी किसी की मासिकता को नही बदल सकते आज लोग महज थोड़े फायदे के लिए किसी
को कष्ट पहुंचाना तो मानो बहोत छोटी बात हैं हम यह कतई नही भाप सकते की लोग कितने
हद तक गिर सकते हैं पर कभी कभी इसके लिए
इन्हे भारी कीमत भी चुकानी पड़ जाती हैं । आज दूसरे का दर्द लोगो के लिए एक तमासे
जैसा हैं कोई किसी कि वास्तविक परेशानियो को समझने की कोशिस नही करता यही नही लोग
दूसरे की परेशानियो को अपने फायदे का मुद्दा भी बना लेते हैं । कई बार हम जिसकी
दिल से इज्जत करते हैं वह भी किसी गलत फहमी के कारण हमसे विवाद कर बैठते हैं और
हमे दुःख देकर खुश होते हैं अनके प्रति जो हमारी प्रेंम भावना इज्जत होती है वह
खुद ही खत्म कर लेते हैं। हर किसी के अंदर एक कमी विद्द्मान होती हो जो उसे पीछे
खीचती है और हमरे सफलता के मार्ग से हमें वक्षिंत करने की कोशिस करती है अगर इसे
हम दूर नही करते तो यह हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है इसलिए हमे जरुरत है।
अपनी कमियो को जानने की और उन्हे खत्म करने की जब तक अपने अंदर इन्हे पनाह देगे तब
तक यह हमारे उपर हावी होती रहेगी हमे जितनी जल्दी इनसे मिजाज मिलेगा उतनी जल्दी हम
अपनी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं पर यह भी हमारी मासिकता पर निर्भर करता है। हम
दूसरो से संम्मान की कामना करते हैं। पर कोई क्यो हमें सम्मान दे दूसरे को सम्मान
देकर ही सम्मान हासिल किया जा सकता है। अपने से बड़ो का सम्मान हर कोई करता है पर
जो अपने से छोटे को सम्मान देते हैं वही सर्वश्रेष्ठ होते हैं,पर इसमें भी अपनी एक मासिकता है। मनुष्य अपने सोच और कर्मो से बड़ा बनता
हैं ना कि धन दौलत से हम अपनी खराब मासिकता को बदलकर ही अच्छे व्यक्ति बनने की
कामना कर सकते हैं।
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